my blogs

Tuesday, March 4, 2014

वसंत ऋतू

प्रिय मित्रों नमस्कार ,
                                 वसंत ऋतू ये अत्यंत ही मनमोहक और सुखद ऋतू है ,किन्तु इस ऋतू में शीत ऋतू में संचित कफ दोष का प्रकोप होता है , कफ दोष के कारण अनेक स्वास्थय समस्याएँ जैसे कास श्वास और प्रतिश्याय यानि कि कास अर्थात खांसी , प्रतिश्याय यानि कि नाक का बहना छींकें आना और श्वास जिसे कि सामान्य भाषा में दमा और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में Asthma के नाम से जाना जाता है।  इन सबमे दमा श्वास ये अधिक कठिन रोग है क्योंकि यह याप्य है अर्थात पूर्णतः चिकित्स्य  नहीं है।  इस बीमारी को पूर्णतः समाप्त नहीं  किया जा सकता , किन्तु इसके लक्षणों को रोका जा सकता है।  
                                                                                                                  यदि आप दमा श्वास के रोगी हैं तो आपको कुछ बातों का ध्यान और सावधानियां रखनी चाहिए। 

१. प्रातः काल यानि सुबह उठ कर ख़ाली पेट एक गिलास गर्म पानी(गुनगुने से थोडा ज्यादा गर्म ) अवश्य पियें , जिस से फेफड़ों और श्वास कि नलिकाओं में जमा हुआ बलगम निकलने में मदद मिले।  यदि बलगम निकलने लगे तब उसे बाहर निकालें गटकें नहीं। 
२. भोजन में खट्टी मीठी और ठंडी चीज़ों का परहेज रखें 
३. भोजन कम मात्रा  में करें ,क्योंकि वसंत ऋतू में कफ दोष के आधिक्य से अग्नि मांद्य होता है , तथा भोजन का पाचन ठीक से नहीं होता। 
४. धुल धुंए से दूर रहें ,और जहां पोलन ग्रैन यानि कि पराग कणो से दमा का दौरा पद सकता है।
५ प्राणायाम और अनुलोम विलोम करने से फेफड़ों में शुद्ध हवा का संचार होता है तथा फेफड़ों को बल मिलता है।
६. तालिसादि चूर्ण और वासा अवलेह , चित्रक अवलेह का सेवन लाभदायक होता है। 
७ वसंत ऋतू में वमन चिकित्सा लेने से स्वाभाविक रूप प्रकुपित कफ दोष का शमन होता है ,देखा गया है कि जो लोग हर वर्ष नियमित रूप से वमन कर्म करवाते हैं ,वो वर्ष भर स्वस्थ रहते हैं और उन्हें कफ दोष जनित विकार भी नहीं होते। 

Monday, June 25, 2012


आयुर्वेद जगत के मित्रों नमस्कार ,
प्रभु धनवंतरी के आशीर्वाद से आयुर्वेदाचार्य (B.A.M.S.) के छात्रों के लिए Online Classes की शुरुवात करने जा रहा हूँ . १ जुलाई २०१२ से जिसका शुभारंभ है . यहाँ मैं प्रथम ,द्वितीय और तृतीय आयुर्वेदाचार्य के लिए , क्रिया शरीर ,रचना शरीर , द्रव्य गुण , रस शास्त्र , चरक पूर्वार्ध और उत्तरार्ध तथा काय चिकित्सा ये विषय पढ़ाऊंगा ... अधिक जानकारी के लिए देखें http://www.ayulifeclinic.x10.mx/online.html यदि किसी को लेक्चर के समय से प्रॉब्लम है या वेब कैम उपलब्ध नहीं है तो बताएं , उनके लिए रेकॉर्डेड लेक्चर ई मेल के द्वारा भेजे जायेंगे .... आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं ...... धन्यवाद आपका आयुर्वेद शिक्षक

Ayu Life Clinic
www.ayulifeclinic.x10.mx

Wednesday, May 23, 2012



हृदयाचा आजार हा सर्वात धोक्याचा आजार असून .... सुरक्ष्तेचा प्राकृतिक आणि शाकाहारी  उपाय आहे ...

मराठी .....


Tamil Language Version.... Vestige flex oil....

ह्रदय रोगों से बचाव के लिए शाकाहारी और सुरक्षित उपाय ....


Thursday, May 17, 2012

मेथी , एक स्वास्थ्य वर्धक औषध

मेथी महत्वपूर्ण औषधियों में से एक है इसमें विटामिन के साथ धात्विक पदार्थ और प्रोटीन प्रचुर मात्रा में पाए जाते है अधिकांश लोग मेथी की कडवाहट के कारण इसे पसंद नहीं करते पर यही कडवाहट खाने का स्वाद बढ़ाता है साथ ही यह भूख बढ़ाने में सहायक होता है मैथी में कडवापन उसमे उपस्थित पदार्थ 'ग्लाइकोसाइड ' के कारण होता है मैथी में फास्फेट , लेसिथिन, विटामिन डी और लौह अयस्क होता है जो आपकी स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करते है ।
~ मेथी दाने ~
- मेथी दाने न सिर्फ शरीर को आंतरिक रूप से मजबूत करते है बल्कि शरीर को बाहरी सुन्दरता देने में भी सहायक हो सकते है मैथी के दानों को पीसकर यदि त्वचा पर लगाया जाए तो यह सुन्दर और मुलायम बनती है. 
- इसका प्रयोग घाव और जलने के इलाज में भी किया जाता है 
- पुराने समय में बच्चे के जन्म को आसान बनाने के लिए गर्भवती स्त्री को मेथी खिलाई जाती थी मैथी में ऐसे पाचक एंजाइम होते है जो आग्नाशय को अधिक क्रिया शील बना देते है 
- इससे पाचन क्रिया भी सरल हो जाती है यह गैस्ट्रिक अल्सर के उपचार में भी उपयोगी है - मेथी के स्टेराइड युक्त सैपोनिन और लस दार रेशे रक्त में शर्करा को कम कर देते है इसलिए मैथी का सेवन मधुमेह रोगियों के लिए भी लाभदायक होता है 
- मेथी को यदि कुछ मात्रा में रोज लिया जाए ओ इससे मानसिक सक्रियता बढ़ती है 
- यह शरीर के कोलेस्ट्रोल का स्तर भी घटाता है । 
- वायु के कारण होने वाले हाथ-पैर के दर्द में मेथीदानों को घी में सेंककर उनका चूर्ण बनायें एवं उसके लड्डू बनाकर प्रतिदिन एक लड्डू का सेवन करें तो लाभ होता है।


~ मेथी के पत्ते ~
- रोज सुबह व श्याम मेथी का रस निकाल कर पियें मधुमय ठीक हो जाती है।
- मेथी की सब्जी में अदरक,गर्म मसाला डालकर खाने से निम्न रक्तचाप में फायदा होता है।
- बच्चों के पेट में कृमि हो जाने पर उन्हें मेथी की भाजी का 1-2 चम्मच रस रोज पिलाने से लाभ होता है।
- रोज हरी अथवा सूखी मेथी का सेवन करने से शरीर के 80 प्रकार के वायु के रोगों में लाभ होता है।
- मेथी की सूखी भाजी को ठंडे पानी में भिगोयें। अच्छी तरह भीग जाने पर मसलकर छान लें एवं उस पानी में शहद मिलाकर एक बार रोगी को पिलायें तो लू में लाभ होता है।
- कफदोष के कारण जिन्हें हमेशा सर्दी-जुकाम-खाँसी की तकलीफ बनी रहती हो उन्हें तिल अथवा सरसों के तेल में गरम मसाला, अदरक एवं लहसुन डालकर बनायी गयी मेथी की सब्जी का प्रतिदिन सेवन करना चाहिए।...........

Monday, April 2, 2012

वृक्क यानि Kidney के विकार

प्रिय मित्रों नमस्कार ,


आज मैं आपसे वृक्क यानि किडनी के विकारों पर चर्चा करना चाहूँगा . किडनी ये शारीर का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग हैं , इसके द्वारा शरीर से  मल  बाहर निकलता है और शरीर के अन्दर साम्यावस्था बनी रहती है , वृक्क शरीर में दो होते हैं .
                            अब सबसे पहले किडनी के रोगों के कारणों पर चर्चा की जाए .
१. आहार में द्रव पदार्थों का अत्यल्प प्रमाण में सेवन करना अथवा अत्यधिक प्रमाण में सेवन करना
२.पीने में कठोर जल का प्रयोग करना
३. मूत्र के वेग को अधिक समय तक रोकना
४. उच्च रक्त दाब यानि के High Blood Pressure यथोचित उपचार ना होना
५ रक्त में कोलेस्ट्रोल की मात्रा अधिक होना ( जिसके कारण किडनी की रक्त वाही धमनियों में रूकावट होकर वहां रक्त का संचार कम हो जाता है , और वहां Ischaemic Renal Failure हो सकता है .
६ किडनी , मूत्राशय के स्थान पर अघात होना उदहारण , एक्सिडेंट हो जाना
७ नशीले पदार्थ जैसे तम्बाखू , भांग अफीम इत्यादि के अत्यधिक सेवन से भी किडनी के रोग हो सकते हैं .


८ मधुमेह के रोगियों को किडनी के बीमारियाँ होने की सम्भावनाये अधिक होती हैं , इन रोगियों को रक्त शर्करा , लिपिड प्रोफाइल और रक्त दाब ( BLOOD PRESSURE) की नियमित जांच करते रहना चाहिए .


आज हमने  किडनी के रोगों के सामान्य हेतुओं पर चर्चा की है ..... 

Saturday, January 21, 2012

आयुर्वेदमन्त्र: घी शत्रु नहीं मित्र .......

आयुर्वेदमन्त्र: घी शत्रु नहीं मित्र .......: प्रिय मित्रों नमस्कार , वर्ष २०१२ का मेरा यह पहला ब्लॉग है . अतः देर से ही सही किन्तु मेरा अभिवादन स्वीकार करें . किन्ही व्यस्तताओं के ...

घी शत्रु नहीं मित्र .......

प्रिय मित्रों नमस्कार ,

वर्ष २०१२ का मेरा यह पहला ब्लॉग है . अतः देर से ही सही किन्तु मेरा अभिवादन स्वीकार करें .  किन्ही व्यस्तताओं के चलते बहुत समय से आप से चर्चा नहीं हो पायी . 
                                                                                               आजकल जिसे देखो वो येही कहता नज़र आता है मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ गया है , कोलेस्ट्रोल बढ़ गया है ; डॉक्टर ने घी तेल चिकनाई का परहेज कहा है ....... एक मरीज़ ने मुझ से कहा की मेरे घुटनों में बहुत दर्द है , मैंने उसे कुछ दवाएं दी और कहा की सुबह खाली पेट २ चम्मच घी खाना है और उसके आधे घंटे तक कुछ नहीं खाना फिर आधे घंटे बाद गर्म पानी पीना है . घी का नाम सुनते ही वो कहने लगा की ये आप क्या कह रहे हैं मैं घी कैसे खा सकता हूँ इससे मेरा कोलेस्ट्रोल बढ़ जायेगा . मैंने कहा मित्र घी की मिठाइयों और खाने के साथ घी का सेवन करने से कोलेस्ट्रोल बढ़ता है न की खाली पेट सिर्फ २ छोटी चम्मच लेने से ......... अब समझिये की मैंने ऐसा क्यों कहा .......... जब आप घी की मिठाई और सब्जियों में घी का सेवन करते हैं तो वो अत्यधिक गुरु यानि की गरिष्ठ होता है . हमारा यकृत (लीवर ) इस अति प्रमाण में उपलब्ध चिकनाई को कोलेस्ट्रोल में बदलता है जो की शारीर के रक्त वाहिनी शिराओं और धमनियों में जाकर जमता है ...... खाली पेट घी खाने पर वह पूरी तरह पच जाता है और वह कोलेस्ट्रोल में बदल नहीं पाता , इस प्रकार वह शारीर की आवश्यकता को पूर्ण करता है . जैसे किसी भी यन्त्र को कार्य करने के लिए चिकने की आवश्यकता होती है , हम मशीन में तेल डालते है तो वह बिना घर्षण के सही कार्य करती है .जब उसमे चिकनाई के साथ धुल जमती है तो वो जाम हो जाती है , उसी प्रकार जब हम आटे के साथ घी अथवा मिठाई के साथ घी खाते हैं तो वो कोलेस्ट्रोल बनने का कारण बनती है ....... दिन भर में मात्र २ से ४ चम्मच घी आपके शरीर की आवश्यकता को पूर्ण कर सकता है दिन भर आपको किसी भी रूप में चिकनाई की आवश्यकता नहीं ...... इसीलिए खाने के साथ घी तेल चिकनाई बहुत ही अल्प प्रमाण में होना चाहिए .......

Friday, September 30, 2011

Preventive Cardiology Through Ayurveda part 2

प्रिय मित्रों नमस्कार ,
                                आप सभी को नवरात्री के इस पावन पर्व पर हार्दिक अभिनन्दन . मातारानी आप सभी को सुख समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य दे . पिछले ब्लॉग में मैंने आपको आपको हृदय रोग से बचाव की चिकित्सा के बारे में बताया था . वास्तव में हमारे देश में विशेष कर महानगरों में बढती हुयी हृदय रोगियों की संख्या एक चिंता का विषय है .क्योंकि आज कल युवाओं में भी हृदय रोग देखा गया है . वास्तव में यदि कुछ समय निकाल कर हम अपने शरीर के ऊपर विचार करें तो हम पाएंगे की हमें थोड़े से चलने फिरने में दम फूल जाता है , शरीर में भारीपन महसूस होता है , शरीर में स्फूर्ति का अभाव है . क्योंकि हमारा अधिकतर समय ऑफिस में कुर्सी पर बैठे हुए जाता है , हम भूख लगने पर पास किसी कैंटीन से समोसे या ओइली खाना खा कर फिर से काम पर लग जाते हैं . हमें बार बार चाय पीने या काफी पीने अथवा सिगरेट पीने का व्यसन लग जाता है . इन सभी क्रिया कलापों से हृदय पर अत्यधिक  कार्यभार बढ़ जाता है . क्योंकि रक्त में गाढ़ा पण बढ़ जाता है , धीरे धीरे ये कोलेस्ट्रोल के रूप में नसों में जमा होने लगता है.
                                             यहाँ पर कुछ महानुभाव ये सोचते हैं की हम रात दिन भूखे रह कर और सलाद खा कर कोलेस्ट्रोल कम कर सकते हैं , मैं उनसे कुछ हद तक सहमत हूँ लेकिन आप यह बताएं के इस सब से आप रक्त में बढे हुए कोलेस्ट्रोल को तो कम कर सकते हैं लेकिन क्या आप नसों में जमे कोलेस्ट्रोल को कम कर पाएंगे ?........................ नहीं ,

इसलिए हम सीरम कोलेस्ट्रोल की रिपोर्ट से अधिक आश्वस्त नहीं हों सकते . इस कार्य को करने के लिए पंचकर्म की क्रियाओं की आवश्यकता है जो आयुर्वेद चिकित्सक के द्वारा की जा सकती है .


इन क्रियाओं में वमन , विरेचन  ये दो प्रमुख हैं ..........

Dr.Abhishek Goel  09425759700,09713677782

Wednesday, September 28, 2011


प्रिय मित्रों नमस्कार ,
                                 आप सभी के प्रेम और आशीर्वाद के साथ मधुमेह और उससे जुडी बहुत सारी ऐसी समस्याओं के इलाज के सम्बन्ध में शिविर लगा रहा हूँ . मधुमेह के साथ तो वैसे बहुत सारी समस्याएं हैं लेकिन उनमे विशेषकर Retinopathy, nephropathy and other microvascular and macrovascular complications  प्रमुख हैं , वास्तव में इन समस्याओं के लक्षण बहुत कालांतर से समझ में आते हैं . इसलिए आयुर्वेद के सिद्धांत के अनुसार स्वस्थस्य स्वास्थय रक्षणं , आतुरस्य विकार प्रशमनं चेती . वास्तव में हमें इस बात का भ्रम रहता है की हम स्वस्थ हैं क्योंकि रोग के लक्षण और रोग का शारीर में प्रसार होने में बहुत अंतर है . हम सिर्फ लक्षणों को देखकर समझते हैं की हमें बीमारी है लेकिन लक्षण उत्पन्न तब होते हैं जब बीमारी बहुत बढ़ जाती है , लेकिन तब ये कहावत कही जाती है ." अब पछताए होत का जब चिड़िया चुग गयी खेत ". एक और महत्त्वपूर्ण बात की मधुमेह के रोगियों को ह्रदय रोग का खतरा सामान्य यानि की बिना मधुमेह की बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति की तुलना में पांच गुना अधिक होता है . 
                                                                                

Saturday, September 17, 2011

Preventive Cardiology through Ayurveda

              
प्रिय मित्रों नमस्कार ,

हम सभी जानते हैं की आज कल की भाग दौड़ से भरी ज़िन्दगी में  हमें जीवन शैली की अनियमितताओं का सामना करना पड़ता है . अनियमित आहार , सही तरह से आराम न कर पाना फास्ट फ़ूड जंक फ़ूड इत्यादि के कारण हमारे शारीर में कोलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ जाती है , जिसे की आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं में (L.D.L., V.L.D.L.) के नाम से जाना जाता है , जिसके बढ़ जाने से इनकी परत धमनियों और शिराओं में जम जाती है . जिसके कारण धमनियों और शिराओं को क्षति पहुचती है और उनकी दीवारों पर thrombocyte जाकर चिपक जाते हैं , जिसके कारण धमनियां और शिराएँ सिकुड़ जाती हैं , और शारीर के महत्त्वपूर्ण अंग जैसे की हृदय , फुफ्फुस वृक्क , मस्तिष्क इत्यादि में रक्त संचार की कमी के कारण इन अंगो में स्थाई क्षति हो सकती है . जिन्हें आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं  Stroke, Angina , Ischemia, Mayo cardial Infarction ,Ischaemic renal disease ,and renal failure इत्यादि के नाम से संबोधित करता है .
                                                         इन सभी स्तिथियों के होने पर अल्पायु में ही हम दवाइयों पर निर्भर होकर सारा जीवन गुज़ार देते हैं . इसके बाद भी आपको सलाह दी जाती है अधिक श्रम न करें , भार न उठायें , भाग दौड़ न करें .....
                             वास्तव में ४० वर्ष की आयु के बाद ये समस्याएँ हमें घेर लेती हैं , इससे बचने का उपाय हैं 
१. पंचकर्म चिकित्सा द्वारा शरीर का शोधन करवाना 
२. तत्पश्चात २ माह तक नियमित औषध सेवन करना 
३.चिकित्सक द्वारा निर्देशित आहार और दिनचर्या का पालन  करना 
आजकल बड़े बड़े अस्पतालों में जो Heart Operations हो रहे हैं .उनमे अत्यधिक व्यय होता है ,लेकिन इसके बाद भी आपको जीवन भर दवाइयों पर निर्भर रहना पड़ता है ,वो भी अत्यधिक परहेज के साथ .
आयुर्वेदिक पंचकर्म चिकित्सा के द्वारा शारीर के भीतर जमी हुयी अशुद्धियों को शोधन प्रक्रिया द्वारा बाहर निकाला जाता है ,तथा आयुर्वेदिक औषधों के द्वारा शारीर को बल देने वाली औषधियों के प्रयोग से हृदय को मजबूत और अधिक कार्यक्षम बनाया जा सकता है , आपको मात्र दो माह की औषध सेवन के पश्चात Hypertension , fatigue , जैसी कोई भी समस्या नहीं रहेगी .
                                                                                       आप आत्मनिर्भर होकर सारा जीवन सुख पूर्वक निर्वाह कर सकते है 
आपके उत्तम स्वस्थ्य की कामना के साथ ........
Dr.Sandeep shah  (09229455119)
Dr.Abhishek Goel (09713677782, 09425759700) 

Friday, August 26, 2011

My Address for Consultation

Dear Friends ,
                                                           Dr.Abhishek Goel                             
                                             House no. C-211      Near Ayushman Hospital,
                                             Infront of Panchmukhi Hanuman Mandir , Shahpura          
                                                            Bhopal (M.P.)                                         
                                Contact no.- 09713677782, 09425759700                                        

      * Please note that i will be available  from 9.am to 3 pm . 

Wednesday, August 10, 2011

वाजीकरण चिकित्सा

जो औषध वंश परंपरा को स्थापित कराती है , अर्थात जिसके सेवन के पश्चात न सिर्फ पुरुष स्वयं रति शक्ति से परिपूर्ण होता है ,अपितु उससे उत्पन्न संतान भी उत्तम वीर्य से युक्त होकर ,स्वस्थ होने के साथ प्रजोत्पादन में समर्थ होती है .इसके सेवन से पुरुष अश्व के समान बलशाली होकर स्त्री गमन करता है , तथा स्त्रियों को अति प्रिय हों जाता है , इसके सेवन से शरीर सुपुष्ट हों जाता है . वृद्ध अवस्था में भी उत्तम संतान जनक वीर्य उत्पन्न होता रहता है . जो संतान उत्पत्ति का मूल है उसे वाजीकरण कहते हैं .........

Saturday, July 9, 2011

रसायन चिकित्सा

प्रिय मित्रों नमस्कार , आज मैं आपको आयुर्वेद के सबसे महत्त्वपूर्ण अंग रसायन चिकित्सा के बारे में आपको बताऊँगा . विशेषतः देखा जाए तो आधुनिक चिकित्सा शास्त्र रोग होने के पश्चात चिकित्सा के उपाय बताता है ,किन्तु आयुर्वेद रोग से बचने के उपाय पहले बताता है यदि फिर भी किसी कारण वश रोग हो जाये तो चिकित्सा के  उपाय बताता है .

१ रसायन चिकित्सा क्या है ?
२ इससे क्या लाभ हैं?

रसायन अष्टांग आयुर्वेद  अर्थात आठ अंगों से युक्त आयुर्वेद का वह भाग है जिसके द्वारा उत्तम स्वास्थय  तथा दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है .दीर्घायुष्य और उत्तम स्वास्थय तभी प्राप्त हो सकता है जब शरीर के सभी अंग सकुशल हों तथा शरीर इ रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्तम हो .इन्ही उद्देश्यों की प्राप्ति  हेतु रसायन चिकित्सा की जाती है . इस चिकित्सा के विधिवत सेवन से दीर्घ आयु , स्मृति (स्मरण शक्ति ) मेधा (समझ कर ग्रहण करने की शक्ति ) उत्तम आरोग्य क लाभ , तरुण वय अर्थात अकाल में वृद्ध न होना इत्यादि लाभ होते हैं .

Tuesday, July 5, 2011

ayurved chikitsakon ke naam


प्रिय मित्रों नमस्कार ,
                           आज मैं शिरोधारा और नस्य के विषय में और उनके मानस तथा neurological disorders के सम्बन्ध में विचार करना चाहूंगा तथा साथ ही साथ आप सभी वैद्यों के मत भी जानना चाहूँगा . हम सभी जानते हैं की वायु रजो गुणात्मक है तथा वात प्रकृति  के व्यक्ति का मन भी रजोगुण से भरा रहता है . वायु के गुणों में एक गुण ये भी कहा गया है "नियंता प्रणेता च मनसः" यानि के वायु जो है वह मन का नियंत्रण करता है तथा साथ में प्रेरक भी है .
          यहाँ जिस वायु विशेष के बारे में कहा गया है ,वोह शास्त्रोक्त विभाजन के आधार पर प्राण वायु है . मानस रोगों में नस्य तथा शिरोधारा का महत्व इसी से सिद्ध है की इन दोनों चिकित्सों से मस्तिष्क में प्रकुपित वायु क शमन होता है . चूंकि शिर यह उत्तमांग कहा गया है क्योंकि इस अंग से शारीर की  सभी क्रियाएँ नियंत्रित होती हैं .
                                                                          आज कल हम देखते हैं की मनुष्य की प्रवृत्ति राजसिक होती जा रही है , जिसके कारण अनेक मानसिक विकार हो रहे हैं , .
                         

Wednesday, June 15, 2011

about brain power

प्रिय मित्रों नमस्कार ,
                                 क्या आप जानते हैं की हमारे मस्तिष्क में ज्ञान की उत्पत्ति कैसे होती है . ज्ञान को प्राप्त करने में मन बुद्धि और अहंकार का संयोग होता है तब ज्ञान का अनुभव होता है. यहाँ अहंकार का अर्थ घमंड नहीं , अहम् यानि की मैं कार यानि की करना , यानि के मैं इस ज्ञान को स्वीकार करता हूँ. 
                                                                                                                            बहुत से लोगों का प्रश्न होता है , की मेरा बालक या बालिका पढाई में एकाग्र नहीं है , उसका मन इधर उधर भटकता है. स्मरण शक्ति कमज़ोर है . मेरा मानना है की यह कोई बड़ी समस्या नहीं है , क्योंकि मैं मानता हूँ की यहाँ मन का कार्य होता है , मन के संयोग के बिना ज्ञान नहीं होता . जैसे की कोई व्यक्ति किसी भी फ़िल्मी गीत को सुनकर तुरंत याद कर लेता है या हो जाता है , क्योंकि उसका मन उस गाने में लग गया था. इसी लिए सबसे पहले जब तक मन उस बात को ग्रहण नहीं करेगा वो बात बुद्धि तक नहीं पहुचेगी . बुद्धि तक नहीं पहुची तो अहम् याने की मैं उसे कैसे स्वीकार करूंगा. 

वैसे ही किसी को कोई बात समझनी है या सिखानी है तो सबसे पहले उस व्यक्ति के लिए बात रुचिकर बनानी होगी . आजकल कंप्यूटर के द्वारा बहुत सारे शिक्षण कार्यक्रम होते हैं ,
                                                                                                          जहां तक एकाग्रता का प्रश्न है , प्राणायाम और अनुलोम विलोम से बढाई जा सकती है , आयुर्वेद में शिरोधरा चिकित्सा भी मस्तिष्क को बल देती है , 
             मेरा कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है की एकाग्रता स्वयं बढाई जा सकती है लेकिन स्मरण शक्ति को बढ़ने के लिए शिरोधरा का महत्त्वपूर्ण योगदान है..........

Sunday, May 15, 2011

giloy/guduchi/amruta...

प्रिय मित्रों, 
                 नमस्कार गिलोय , गुडूची या अमृता , ये नाम उस अमृत समान गुणकारी औषध के हैं जिसके बारे में जितना बताया जाये उतना कम है, यहाँ में आपको इसके कुछ विशेष महत्वपूर्ण गुणों के बारे में बताऊँगा. इसका सबसे ख़ास कार्य है रोग प्रति रोधक क्षमता को बढ़ाना . इसके सेवन से उच्च रक्त चाप यानि की ( high blood pressure) की समस्या दूर होती है. क्योंकि इसके तिक्त और कषाय रस के कारण यह कोलेस्ट्रोल को कम करता है. यह बात आप स्वयं इसके सेवन के पश्चात अनुभव करेंगे , क्योंकि इसके सेवन से रक्त चाप सुधरता है तथा एक विशेष प्रकार की स्फूर्ति तथा हल्कापन लगता है. स्वाद में कड़वा होता है लेकिन इसका कडवापन अधिक देर तक जिव्हा पर नहीं रहता . 
                                        यह शारीर का शोधन (purification) करता है , कैंसर कर्करोग में यह विकृत कोशिका के प्रसार को रोकता है तथा उपचार में सहयोगी सिध्ध होता है , 
                                                                                        वास्तव में बताने को तो बहुत कुछ है लेकिन गागर में सागर नहीं भरा जा सकता इस लिए इतना ही कहूँगा. इस औषध के प्रयोग अनेक हैं , पर वे चिकित्सक के ज्ञान पर निर्भर हैं ,
                                        

Wednesday, May 4, 2011

stan paan

प्रिय मित्रों नमस्कार , 
                                लम्बे समय के बाद आपके समक्ष  उपस्थित हुआ हूँ . आज मैं एक ऐसी समस्या को लेकर विचार विमर्श करना चाहता हूँ. जिस विषय से अधिकतर लोग अनभिज्ञ हैं. मेरा आज का विषय है स्तन पान , हम सभी जानते हैं की माँ का दूध शिशु के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है , क्योंकि वह शिशु के विकास tके लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. आज कल आहार विहार संबंधी गलतियों के चलते रस धातु की विकृति हो जाती है , जिसके कारण स्त्रियों में स्तन्य (मिल्क) की उतपत्ति नहीं होती या होती भी है तो वह दोष युक्ता होता है जिस से शिशुओं में अनेक प्रकार की बीमारिया होने की संभावना होती है 
                                                                              वास्तव में प्रकृति ने प्रत्येक जीव जंतु को अलग बनाया है . कई लोग माता का दूध न स्त्राव होने की स्तिथि में गाय अथवा भैंस का दूध शिशु को देते हैं जो उसके मानसिक शारीरिक और बौद्धिक विकास में अवरोध उत्पन्न करता है . 
                                                                                        बहुत से लोगों को यह भी जानकारी नहीं है की यदि माँ का दूध नहीं निकलता है तो इस का उपचार संभव है . आयुर्वेद संहिताओं में इस समस्या एवं इसके उपचार के सम्बन्ध में वर्णन मिलता है . 
                                                याद रखिये माँ का स्थान इस संसार में भगवान भी नहीं ले सकते . ऐसी समस्या के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक का परामर्श अवश्य ले . 
                                                                                                   धन्यवाद ........