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Saturday, July 9, 2011

रसायन चिकित्सा

प्रिय मित्रों नमस्कार , आज मैं आपको आयुर्वेद के सबसे महत्त्वपूर्ण अंग रसायन चिकित्सा के बारे में आपको बताऊँगा . विशेषतः देखा जाए तो आधुनिक चिकित्सा शास्त्र रोग होने के पश्चात चिकित्सा के उपाय बताता है ,किन्तु आयुर्वेद रोग से बचने के उपाय पहले बताता है यदि फिर भी किसी कारण वश रोग हो जाये तो चिकित्सा के  उपाय बताता है .

१ रसायन चिकित्सा क्या है ?
२ इससे क्या लाभ हैं?

रसायन अष्टांग आयुर्वेद  अर्थात आठ अंगों से युक्त आयुर्वेद का वह भाग है जिसके द्वारा उत्तम स्वास्थय  तथा दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है .दीर्घायुष्य और उत्तम स्वास्थय तभी प्राप्त हो सकता है जब शरीर के सभी अंग सकुशल हों तथा शरीर इ रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्तम हो .इन्ही उद्देश्यों की प्राप्ति  हेतु रसायन चिकित्सा की जाती है . इस चिकित्सा के विधिवत सेवन से दीर्घ आयु , स्मृति (स्मरण शक्ति ) मेधा (समझ कर ग्रहण करने की शक्ति ) उत्तम आरोग्य क लाभ , तरुण वय अर्थात अकाल में वृद्ध न होना इत्यादि लाभ होते हैं .

Tuesday, July 5, 2011

ayurved chikitsakon ke naam


प्रिय मित्रों नमस्कार ,
                           आज मैं शिरोधारा और नस्य के विषय में और उनके मानस तथा neurological disorders के सम्बन्ध में विचार करना चाहूंगा तथा साथ ही साथ आप सभी वैद्यों के मत भी जानना चाहूँगा . हम सभी जानते हैं की वायु रजो गुणात्मक है तथा वात प्रकृति  के व्यक्ति का मन भी रजोगुण से भरा रहता है . वायु के गुणों में एक गुण ये भी कहा गया है "नियंता प्रणेता च मनसः" यानि के वायु जो है वह मन का नियंत्रण करता है तथा साथ में प्रेरक भी है .
          यहाँ जिस वायु विशेष के बारे में कहा गया है ,वोह शास्त्रोक्त विभाजन के आधार पर प्राण वायु है . मानस रोगों में नस्य तथा शिरोधारा का महत्व इसी से सिद्ध है की इन दोनों चिकित्सों से मस्तिष्क में प्रकुपित वायु क शमन होता है . चूंकि शिर यह उत्तमांग कहा गया है क्योंकि इस अंग से शारीर की  सभी क्रियाएँ नियंत्रित होती हैं .
                                                                          आज कल हम देखते हैं की मनुष्य की प्रवृत्ति राजसिक होती जा रही है , जिसके कारण अनेक मानसिक विकार हो रहे हैं , .
                         

Wednesday, June 15, 2011

about brain power

प्रिय मित्रों नमस्कार ,
                                 क्या आप जानते हैं की हमारे मस्तिष्क में ज्ञान की उत्पत्ति कैसे होती है . ज्ञान को प्राप्त करने में मन बुद्धि और अहंकार का संयोग होता है तब ज्ञान का अनुभव होता है. यहाँ अहंकार का अर्थ घमंड नहीं , अहम् यानि की मैं कार यानि की करना , यानि के मैं इस ज्ञान को स्वीकार करता हूँ. 
                                                                                                                            बहुत से लोगों का प्रश्न होता है , की मेरा बालक या बालिका पढाई में एकाग्र नहीं है , उसका मन इधर उधर भटकता है. स्मरण शक्ति कमज़ोर है . मेरा मानना है की यह कोई बड़ी समस्या नहीं है , क्योंकि मैं मानता हूँ की यहाँ मन का कार्य होता है , मन के संयोग के बिना ज्ञान नहीं होता . जैसे की कोई व्यक्ति किसी भी फ़िल्मी गीत को सुनकर तुरंत याद कर लेता है या हो जाता है , क्योंकि उसका मन उस गाने में लग गया था. इसी लिए सबसे पहले जब तक मन उस बात को ग्रहण नहीं करेगा वो बात बुद्धि तक नहीं पहुचेगी . बुद्धि तक नहीं पहुची तो अहम् याने की मैं उसे कैसे स्वीकार करूंगा. 

वैसे ही किसी को कोई बात समझनी है या सिखानी है तो सबसे पहले उस व्यक्ति के लिए बात रुचिकर बनानी होगी . आजकल कंप्यूटर के द्वारा बहुत सारे शिक्षण कार्यक्रम होते हैं ,
                                                                                                          जहां तक एकाग्रता का प्रश्न है , प्राणायाम और अनुलोम विलोम से बढाई जा सकती है , आयुर्वेद में शिरोधरा चिकित्सा भी मस्तिष्क को बल देती है , 
             मेरा कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है की एकाग्रता स्वयं बढाई जा सकती है लेकिन स्मरण शक्ति को बढ़ने के लिए शिरोधरा का महत्त्वपूर्ण योगदान है..........

Sunday, May 15, 2011

giloy/guduchi/amruta...

प्रिय मित्रों, 
                 नमस्कार गिलोय , गुडूची या अमृता , ये नाम उस अमृत समान गुणकारी औषध के हैं जिसके बारे में जितना बताया जाये उतना कम है, यहाँ में आपको इसके कुछ विशेष महत्वपूर्ण गुणों के बारे में बताऊँगा. इसका सबसे ख़ास कार्य है रोग प्रति रोधक क्षमता को बढ़ाना . इसके सेवन से उच्च रक्त चाप यानि की ( high blood pressure) की समस्या दूर होती है. क्योंकि इसके तिक्त और कषाय रस के कारण यह कोलेस्ट्रोल को कम करता है. यह बात आप स्वयं इसके सेवन के पश्चात अनुभव करेंगे , क्योंकि इसके सेवन से रक्त चाप सुधरता है तथा एक विशेष प्रकार की स्फूर्ति तथा हल्कापन लगता है. स्वाद में कड़वा होता है लेकिन इसका कडवापन अधिक देर तक जिव्हा पर नहीं रहता . 
                                        यह शारीर का शोधन (purification) करता है , कैंसर कर्करोग में यह विकृत कोशिका के प्रसार को रोकता है तथा उपचार में सहयोगी सिध्ध होता है , 
                                                                                        वास्तव में बताने को तो बहुत कुछ है लेकिन गागर में सागर नहीं भरा जा सकता इस लिए इतना ही कहूँगा. इस औषध के प्रयोग अनेक हैं , पर वे चिकित्सक के ज्ञान पर निर्भर हैं ,
                                        

Wednesday, May 4, 2011

stan paan

प्रिय मित्रों नमस्कार , 
                                लम्बे समय के बाद आपके समक्ष  उपस्थित हुआ हूँ . आज मैं एक ऐसी समस्या को लेकर विचार विमर्श करना चाहता हूँ. जिस विषय से अधिकतर लोग अनभिज्ञ हैं. मेरा आज का विषय है स्तन पान , हम सभी जानते हैं की माँ का दूध शिशु के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है , क्योंकि वह शिशु के विकास tके लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. आज कल आहार विहार संबंधी गलतियों के चलते रस धातु की विकृति हो जाती है , जिसके कारण स्त्रियों में स्तन्य (मिल्क) की उतपत्ति नहीं होती या होती भी है तो वह दोष युक्ता होता है जिस से शिशुओं में अनेक प्रकार की बीमारिया होने की संभावना होती है 
                                                                              वास्तव में प्रकृति ने प्रत्येक जीव जंतु को अलग बनाया है . कई लोग माता का दूध न स्त्राव होने की स्तिथि में गाय अथवा भैंस का दूध शिशु को देते हैं जो उसके मानसिक शारीरिक और बौद्धिक विकास में अवरोध उत्पन्न करता है . 
                                                                                        बहुत से लोगों को यह भी जानकारी नहीं है की यदि माँ का दूध नहीं निकलता है तो इस का उपचार संभव है . आयुर्वेद संहिताओं में इस समस्या एवं इसके उपचार के सम्बन्ध में वर्णन मिलता है . 
                                                याद रखिये माँ का स्थान इस संसार में भगवान भी नहीं ले सकते . ऐसी समस्या के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक का परामर्श अवश्य ले . 
                                                                                                   धन्यवाद ........

Monday, March 21, 2011

ghrit kumari(Aloe vera)

प्रिय मित्रों आप सभी को होली एवं भाई दूज की हार्दिक शुभकामनाये . आज मैं आपको ऐसे औषधीय पौधे के बारे में बताना चाहता हूँ जो की वास्तव में प्रकृति का उपहार है. हम सभी जानते हैं की एलो वेरा जिसे की आम बोलचाल की भाषा में ग्वार पाठ या घृत कुमारी कहा जाता है. इसका प्रयोज्य अंग इसके डंठलों में पाया जाने वाला चिकना पदार्थ है जिसे पल्प कहा जाता है.
                                                                       आजकल इसका प्रयोग सौंदर्य प्रसाधनों में किया जाता है. परन्तु यह मात्र इसी उपयोग के लिए नहीं है ,इसके अन्य बहुत सारे महत्वपूर्ण उपयोग हैं . जिसमे सबसे अधिक महत्वपूर्ण है की अचानक जल जाने या कट जाने पर इसके लगाने से तुरंत आराम मिलता है. पेप्टिक अल्सर में यानि की अन्त्रों में छाले हो जाने पर इसके रस को पीने से छालों का घाव भर जाता है और एसिडिटी में आराम मिलता है , 
                                  मधुमेह में इसका उपयोग करने पर यह रक्त शर्करा के नियमन में मदद करता है तथा यकृत एवं अग्नाशय के चयापचय में सुधार लता है. 
अत्यधिक मद्यपान करने से लीवर में उत्पन्न विकारों को दूर करने में मदद करता है . कैंसर में इसका उपयोग एंटी ओक्सिडेंट के रूप में किया जाता है. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने में मदद मिलती है. 
                                                                                                                                  इसीलिए तो कहते हैं आयुर्वेद अमृत के सामान है . जय हिंद .......... 

Wednesday, March 16, 2011

holi me twacha rog

प्रिय मित्रों ,
                    नमस्कार आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें.  होली रंगों का त्यौहार है , यदि हम चाहते हैं की हमारी होली सुखद और सौहाद्रपूर्ण गुज़रे तो हमें कुछ बातों का ध्यान  रखना होगा. होली में कई बार घटिया रंगों का इस्तेमाल किया जाता है , कई बार रंगों में अम्लता पायी जाती है . जिससे त्वचा को नुक्सान पहुँच सकता है. जहां तक संभव हो होली गुलाल से ही मनाई जाए. इससे दो लाभ होंगे एक त्वचा  को नुक्सान नहीं होगा और दूसरा पानी की बचत होगी. 
                                        और एक विशेष बात होली के दिन किसी भी प्रकार का नशा न करें क्योंकि बहुत सारे लोग भांग का नशा करते हैं , बहुत से लोग शराब भी पीते हैं .इन सभी वजहों से दुर्घटना होने की संभावनाएं
 होती हैं.   
                होली खेलने जाने से पहले अपने पूरे शारीर पर नारियल तेल लगा लें. यह आपकी त्वचा पर सुरक्षा कवच का कार्य करेगा . रंगों से यदि कोई विकार उत्पन्न होता है तो त्वचा को साफ़ पानी से धोकर उस पर ग्वार पाठा का रस लगाना चाहिए.