प्रिय मित्रों नमस्कार ,
आज मैं आपको कैंसर के मरीजों के लिए उपयुक्त आहार बताऊँगा , कैंसर के मरीजों के लिए जैसा की उन्हें अग्निमांद्य होता है लघु एवं स्निग्ध आहार लेना चाहिए , गोघृत का सेवन इनके लिए अत्यधिक लाभप्रद है, भोजन के लेने के लिए एक बार में अधिक गरिष्ठ भोजन न लें ,क्योंकि उससे गैस अपचन जैसी समस्याएँ हो सकती हैं . ४ बार में थोडा थोडा भोजन लें , वैसे प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए तथा पाचक अग्नि के बल- अबल की स्तिथि को देखते हुए आहार का निर्धारण करना चाहिए , इसीलिए मैं संपूर्ण आयुर्वेदीय चिकित्सा उसी को मानता हूँ जिसमे मात्र औषध ही नहीं वरन आहार तथा विहार यानि की दैनिक जीवन की आदतें इन सभी का नियमन होता है , औषध आहार विहार तीनों से मिलकर ही संपूर्ण चिकित्सा होती है , शीघ्र ही आप मुझसे इंदौर में संपर्क कर सकेंगे .मैं अपने बैठने का स्थान और समय शीघ्र ही ब्लॉग पर पोस्ट करूंगा आपके सहयोग के लिए धन्यवाद्
Tuesday, November 2, 2010
Saturday, October 30, 2010
naye clinic ke baare me
प्रिय मित्रों नमस्कार ,
आप लोगों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये ,आप सभी का जीवन मंगलमय और स्वास्थ्यप्रद रहे ऐसी
भावना के साथ आयु लाइफ क्लिनिक के सभी सदस्यों की और से बधाई . आप लोगों से शीघ्र ही पुनः वार्तालाप होगा, नयी जानकारियों के साथ ,
आप लोगों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये ,आप सभी का जीवन मंगलमय और स्वास्थ्यप्रद रहे ऐसी
भावना के साथ आयु लाइफ क्लिनिक के सभी सदस्यों की और से बधाई . आप लोगों से शीघ्र ही पुनः वार्तालाप होगा, नयी जानकारियों के साथ ,
Tuesday, October 19, 2010
manas rog aur ayurved
प्रिय मित्रों , मानस रोगों के उपचार के लिया आयुर्वेद में शिरोधरा का महत्वपूर्ण योगदान है . इस चिकित्सा से मनुष्य के मस्तिष्क को आराम मिलता है , कई बार anxiety and depression के केस देखने को मिलते हैं जिनमे की मनुष्य की सोचने और समझने की शक्ति हीन हो जाती है , confusion and dilemma बना ही रहता है . मनुष्य की सोच विचार सही करता भी है तो वह अपनी भावनाओं को सही तरह से व्यक्त नहीं कर पाता जिसके कारण गुस्से और चिड्चिदेपन का शिकार हो जाता है .
शिरोधरा प्रातःकाल में की जाने वाली आयुर्वेदीय पंचकर्म therapy है .इस के द्वारा अनिद्रा , मानसिक तनाव अशांति और अन्य CNS AND पनस अर्थात brain and spinal chord and other neurological disorders में लाभ होता है , इसके साथ आहार विहार और औषध का प्रयोग किया जाता है जो मानसिक स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने में मदद करता है .
शिरोधरा प्रातःकाल में की जाने वाली आयुर्वेदीय पंचकर्म therapy है .इस के द्वारा अनिद्रा , मानसिक तनाव अशांति और अन्य CNS AND पनस अर्थात brain and spinal chord and other neurological disorders में लाभ होता है , इसके साथ आहार विहार और औषध का प्रयोग किया जाता है जो मानसिक स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने में मदद करता है .
Monday, October 18, 2010
manas rogon ke baare me...........
प्रिय मित्रों , आज मैं मानस रोगों के अन्य कारणों के बारे में बताऊँगा और साथ में उनसे बचाव के उपाय भी बताऊँगा .
१. किसी प्रिय व्यक्ति अथवा वस्तु के विछोह में. इस के कारण मन उद्वेलित होता रहता है.
अब मानस रोगों से बचाव के बारे में बतलाऊँगा .
१. हम सभी जानते हैं की हमारे मस्तिष्क के दो भाग होते हैं ( two cerebral hemispheres) होते हैं जो की परस्पर विपरीत दिशाओं की मानसिक एवं शारीरिक क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं , यह हुयी आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की बात अब आयुर्वेदानुसार नाड़ियों का वर्णन है इडा और पिंगला . अपने कभी अनुभव किया हो तो नाक के एक छिद्र से गर्म और दुसरे से ठंडी हवा का वहां होता है इसका अर्थ यह है यह दोनों नाड़ियाँ शरीर का तापमान का नियंत्रण रखती हैं , वास्तव में इन दोनों का सही संतुलन अतिआवश्यक है , वास्तव में मस्तिष्क को सही कार्य करने के लिए दो भागों का सही संतुलन आवश्यक है. यह संतुलन प्राणायाम और योग के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है . योग के द्वारा मानसिक एवं शारीरिक क्रियाओं में संतुलन के द्वारा ही स्वस्थ रहा जा सकता है . अगले ब्लॉग में अन्य उपायों के बारे में बतलाऊँगा.
१. किसी प्रिय व्यक्ति अथवा वस्तु के विछोह में. इस के कारण मन उद्वेलित होता रहता है.
अब मानस रोगों से बचाव के बारे में बतलाऊँगा .
१. हम सभी जानते हैं की हमारे मस्तिष्क के दो भाग होते हैं ( two cerebral hemispheres) होते हैं जो की परस्पर विपरीत दिशाओं की मानसिक एवं शारीरिक क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं , यह हुयी आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की बात अब आयुर्वेदानुसार नाड़ियों का वर्णन है इडा और पिंगला . अपने कभी अनुभव किया हो तो नाक के एक छिद्र से गर्म और दुसरे से ठंडी हवा का वहां होता है इसका अर्थ यह है यह दोनों नाड़ियाँ शरीर का तापमान का नियंत्रण रखती हैं , वास्तव में इन दोनों का सही संतुलन अतिआवश्यक है , वास्तव में मस्तिष्क को सही कार्य करने के लिए दो भागों का सही संतुलन आवश्यक है. यह संतुलन प्राणायाम और योग के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है . योग के द्वारा मानसिक एवं शारीरिक क्रियाओं में संतुलन के द्वारा ही स्वस्थ रहा जा सकता है . अगले ब्लॉग में अन्य उपायों के बारे में बतलाऊँगा.
Thursday, October 7, 2010
maanas rog
प्रिय मित्रों नमस्कार ,
लम्बे अंतराल के बाद आपके समक्ष प्रस्तुत हुआ हूँ, आज मैं आपको मानस रोगों के कारण बतलाऊँगा जैसा की आचार्यों ने शास्त्रों में वर्णन किया है , मनुष्य की उत्पत्ति में चौबीस तत्वों का संयोग है , इनमे मन , बुद्धि अहंकार यह तत्व मनुष्य की सोचने समझने और यत्न पूर्वक काम करने में मदद करते हैं , इन्ही विकृति से मानस रोग उत्पन्न होते हैं ,
१. अत्यधिक धूम्रपान एवं मद्यपान (शराब ) पीने के कारण मस्तिष्क के केंद्र प्रभावित होते हैं , बोलने चलने के साथ बुद्धि का भी नाश करते हैं , इनके सेवन से नाड़ियों में दुर्बलता और विवेक का नाश होता है ,मनुष्य अवसाद का शिकार हो जाता है, मद्यपान करने के बाद मनुष्य जिस स्फूर्ति का अनुभव करता है उसका कारण यह है की शराब अपने तीक्ष्ण और शीघ्र गति करने के कारण मन और बुद्धि को उत्तेजित करती है और मनुष्य के मन में एक साथ अनेक विचार आने लगते हैं वह कभी प्रसन्ना तो कभी दुखी हो जाता है , इस उत्तेजना के कारण मन और बुद्धि थक जाते हैं , इसके कारण मनुष्य अवसाद का शिकार हो जाता है .
२. किसी पवित्र स्थल पर अपवित्र कार्य करने के कारण किसी देव गुरु भद्र पुरुष का अपमान करने से , मैं जानता हूँ की आजकल के युग में कोई इस बात को इतना महत्वा नहीं देता पर शास्त्रों में इसका उल्लेख मिलता है जिसके पीछे भी रहस्य है , यह बात भी परम सत्य है , इसके पीछे वैज्ञानिक कारण क्या हैं यह तो नहीं पता पर
ऐसा देखा गया है .
३. मन में किसी दुर्भावना को रखना , किसी के प्रति शत्रुता रखना , यदि आप किसी के प्रति द्वेष भावना रखते है तो आप स्वयं को भी तनाव ग्रस्त और चिंतित पाते हैं , मन में बदले की भावना रखना यह भी मानस रोगों के कारण है हमें अपने मन में क्षमा और दया रखना चाहिए , क्षमा करने से मन साफ़ होता है और इसके बाद आप तनाव मुक्त हो जाते हैं , जैन दर्शन में तो क्षमा का बहुत महत्वा बताया है
अभी और भी बहुत से कारण हैं इसकी चर्चा आगे करूंगा .
लम्बे अंतराल के बाद आपके समक्ष प्रस्तुत हुआ हूँ, आज मैं आपको मानस रोगों के कारण बतलाऊँगा जैसा की आचार्यों ने शास्त्रों में वर्णन किया है , मनुष्य की उत्पत्ति में चौबीस तत्वों का संयोग है , इनमे मन , बुद्धि अहंकार यह तत्व मनुष्य की सोचने समझने और यत्न पूर्वक काम करने में मदद करते हैं , इन्ही विकृति से मानस रोग उत्पन्न होते हैं ,
१. अत्यधिक धूम्रपान एवं मद्यपान (शराब ) पीने के कारण मस्तिष्क के केंद्र प्रभावित होते हैं , बोलने चलने के साथ बुद्धि का भी नाश करते हैं , इनके सेवन से नाड़ियों में दुर्बलता और विवेक का नाश होता है ,मनुष्य अवसाद का शिकार हो जाता है, मद्यपान करने के बाद मनुष्य जिस स्फूर्ति का अनुभव करता है उसका कारण यह है की शराब अपने तीक्ष्ण और शीघ्र गति करने के कारण मन और बुद्धि को उत्तेजित करती है और मनुष्य के मन में एक साथ अनेक विचार आने लगते हैं वह कभी प्रसन्ना तो कभी दुखी हो जाता है , इस उत्तेजना के कारण मन और बुद्धि थक जाते हैं , इसके कारण मनुष्य अवसाद का शिकार हो जाता है .
२. किसी पवित्र स्थल पर अपवित्र कार्य करने के कारण किसी देव गुरु भद्र पुरुष का अपमान करने से , मैं जानता हूँ की आजकल के युग में कोई इस बात को इतना महत्वा नहीं देता पर शास्त्रों में इसका उल्लेख मिलता है जिसके पीछे भी रहस्य है , यह बात भी परम सत्य है , इसके पीछे वैज्ञानिक कारण क्या हैं यह तो नहीं पता पर
ऐसा देखा गया है .
३. मन में किसी दुर्भावना को रखना , किसी के प्रति शत्रुता रखना , यदि आप किसी के प्रति द्वेष भावना रखते है तो आप स्वयं को भी तनाव ग्रस्त और चिंतित पाते हैं , मन में बदले की भावना रखना यह भी मानस रोगों के कारण है हमें अपने मन में क्षमा और दया रखना चाहिए , क्षमा करने से मन साफ़ होता है और इसके बाद आप तनाव मुक्त हो जाते हैं , जैन दर्शन में तो क्षमा का बहुत महत्वा बताया है
अभी और भी बहुत से कारण हैं इसकी चर्चा आगे करूंगा .
Tuesday, September 21, 2010
cancer se bachav aur badhne se rokne ke upaay
प्रिय मित्रों ,
पिछले ब्लॉग में मैंने आपको कैंसर होने का मूल कारण बताया था . अब मैं आपको बचाव और बढ़ने से रोकने का उपाय बताऊँगा , सबसे पहले जिन जिन कारणों को हम जानते हैं उनका त्याग करना अनिवार्य है .
जो लोग कैंसर के रोगी हैं वोह सुबह उठ कर प्राणायाम एवं योग करें , शुद्ध वायु अत्यधिक लाभदायक है , प्रतिदिन गाज़र मूली टमाटर का रस पियें , गरिष्ठ भोजन का त्याग करें . हलके और चिकनाई युक्ता आहार का सेवन करें ,चलना फिरना आपके स्वास्थ्य के लिए अतिआवश्यक है .
पिछले ब्लॉग में मैंने आपको कैंसर होने का मूल कारण बताया था . अब मैं आपको बचाव और बढ़ने से रोकने का उपाय बताऊँगा , सबसे पहले जिन जिन कारणों को हम जानते हैं उनका त्याग करना अनिवार्य है .
जो लोग कैंसर के रोगी हैं वोह सुबह उठ कर प्राणायाम एवं योग करें , शुद्ध वायु अत्यधिक लाभदायक है , प्रतिदिन गाज़र मूली टमाटर का रस पियें , गरिष्ठ भोजन का त्याग करें . हलके और चिकनाई युक्ता आहार का सेवन करें ,चलना फिरना आपके स्वास्थ्य के लिए अतिआवश्यक है .
Friday, September 17, 2010
cancer karkrog
प्रिय मित्रों नमस्कार, आज मैं आपको कैंसर यानि कर्करोग के बारे में जानकारी देने जा रहा हूँ . इस रोग के अनेक कारण होते हैं , जो की हम सब जानते हैं , जानने योग्य बात यह है की ये किन किन अंगो में हो सकता है , यह रोग शरीर के किसी भी अंग से शुरू होकर कही भी फैल सकता है क्योंकि कैंसर ग्रस्त कोशिका रक्त संचार के द्वारा एक प्रभावित भाग से दुसरे स्वस्थ भाग में पहुँच कर उसे भी कैंसर ग्रस्त कर सकती है . कैंसर एवं एड्स जैसी बिमारियों के भयानक होने का कारण यह है की ये मनुष्य के जींस और क्रोमोसोम पर हमला करती है
आचार्य चरक के अनुसार हमारे शरीर में पुरानी कोशिकाओं का नाश तथा नयी कोशिका निर्माण की प्रक्रिया निरंतर चलती है यहाँ ये बात ध्यान देने योग्य है की ये दोनों प्रक्रियाएं समान गति से होने के कारण हमें इसका अनुभव नहीं होता कैंसर में निर्माण की प्रक्रिया अनियंत्रित होती है और इसमें जो कोशिकाएं निर्मित होती हैं वे अविकसित और विकृत होने के कारण कार्य करने योग्य नहीं होती , शरीर के लिए अनुपयोगी सिद्ध होती हैं . चरकचार्य के अनुसार विकृत कोशिका निर्माण की प्रक्रिया को रोकना ही कैंसर का उपचार है जिससे नयी कोशिकाओं का निर्माण सही रूप से हो सके . आजकल कैंसर के उपचार के लिया chemo थेरपी का उपयोग किया जाता है जो की विषैली होती हैं आयुर्वेद में कैंसर को बढ़ने से रोकने के लिए उपचार कहे गए हैं इस विषय में आगे बहुत सारी चर्चा करना है जो की में आपको अगले ब्लोग्स में दूंगा
आचार्य चरक के अनुसार हमारे शरीर में पुरानी कोशिकाओं का नाश तथा नयी कोशिका निर्माण की प्रक्रिया निरंतर चलती है यहाँ ये बात ध्यान देने योग्य है की ये दोनों प्रक्रियाएं समान गति से होने के कारण हमें इसका अनुभव नहीं होता कैंसर में निर्माण की प्रक्रिया अनियंत्रित होती है और इसमें जो कोशिकाएं निर्मित होती हैं वे अविकसित और विकृत होने के कारण कार्य करने योग्य नहीं होती , शरीर के लिए अनुपयोगी सिद्ध होती हैं . चरकचार्य के अनुसार विकृत कोशिका निर्माण की प्रक्रिया को रोकना ही कैंसर का उपचार है जिससे नयी कोशिकाओं का निर्माण सही रूप से हो सके . आजकल कैंसर के उपचार के लिया chemo थेरपी का उपयोग किया जाता है जो की विषैली होती हैं आयुर्वेद में कैंसर को बढ़ने से रोकने के लिए उपचार कहे गए हैं इस विषय में आगे बहुत सारी चर्चा करना है जो की में आपको अगले ब्लोग्स में दूंगा
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