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Wednesday, September 28, 2011


प्रिय मित्रों नमस्कार ,
                                 आप सभी के प्रेम और आशीर्वाद के साथ मधुमेह और उससे जुडी बहुत सारी ऐसी समस्याओं के इलाज के सम्बन्ध में शिविर लगा रहा हूँ . मधुमेह के साथ तो वैसे बहुत सारी समस्याएं हैं लेकिन उनमे विशेषकर Retinopathy, nephropathy and other microvascular and macrovascular complications  प्रमुख हैं , वास्तव में इन समस्याओं के लक्षण बहुत कालांतर से समझ में आते हैं . इसलिए आयुर्वेद के सिद्धांत के अनुसार स्वस्थस्य स्वास्थय रक्षणं , आतुरस्य विकार प्रशमनं चेती . वास्तव में हमें इस बात का भ्रम रहता है की हम स्वस्थ हैं क्योंकि रोग के लक्षण और रोग का शारीर में प्रसार होने में बहुत अंतर है . हम सिर्फ लक्षणों को देखकर समझते हैं की हमें बीमारी है लेकिन लक्षण उत्पन्न तब होते हैं जब बीमारी बहुत बढ़ जाती है , लेकिन तब ये कहावत कही जाती है ." अब पछताए होत का जब चिड़िया चुग गयी खेत ". एक और महत्त्वपूर्ण बात की मधुमेह के रोगियों को ह्रदय रोग का खतरा सामान्य यानि की बिना मधुमेह की बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति की तुलना में पांच गुना अधिक होता है . 
                                                                                

Saturday, September 17, 2011

Preventive Cardiology through Ayurveda

              
प्रिय मित्रों नमस्कार ,

हम सभी जानते हैं की आज कल की भाग दौड़ से भरी ज़िन्दगी में  हमें जीवन शैली की अनियमितताओं का सामना करना पड़ता है . अनियमित आहार , सही तरह से आराम न कर पाना फास्ट फ़ूड जंक फ़ूड इत्यादि के कारण हमारे शारीर में कोलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ जाती है , जिसे की आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं में (L.D.L., V.L.D.L.) के नाम से जाना जाता है , जिसके बढ़ जाने से इनकी परत धमनियों और शिराओं में जम जाती है . जिसके कारण धमनियों और शिराओं को क्षति पहुचती है और उनकी दीवारों पर thrombocyte जाकर चिपक जाते हैं , जिसके कारण धमनियां और शिराएँ सिकुड़ जाती हैं , और शारीर के महत्त्वपूर्ण अंग जैसे की हृदय , फुफ्फुस वृक्क , मस्तिष्क इत्यादि में रक्त संचार की कमी के कारण इन अंगो में स्थाई क्षति हो सकती है . जिन्हें आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं  Stroke, Angina , Ischemia, Mayo cardial Infarction ,Ischaemic renal disease ,and renal failure इत्यादि के नाम से संबोधित करता है .
                                                         इन सभी स्तिथियों के होने पर अल्पायु में ही हम दवाइयों पर निर्भर होकर सारा जीवन गुज़ार देते हैं . इसके बाद भी आपको सलाह दी जाती है अधिक श्रम न करें , भार न उठायें , भाग दौड़ न करें .....
                             वास्तव में ४० वर्ष की आयु के बाद ये समस्याएँ हमें घेर लेती हैं , इससे बचने का उपाय हैं 
१. पंचकर्म चिकित्सा द्वारा शरीर का शोधन करवाना 
२. तत्पश्चात २ माह तक नियमित औषध सेवन करना 
३.चिकित्सक द्वारा निर्देशित आहार और दिनचर्या का पालन  करना 
आजकल बड़े बड़े अस्पतालों में जो Heart Operations हो रहे हैं .उनमे अत्यधिक व्यय होता है ,लेकिन इसके बाद भी आपको जीवन भर दवाइयों पर निर्भर रहना पड़ता है ,वो भी अत्यधिक परहेज के साथ .
आयुर्वेदिक पंचकर्म चिकित्सा के द्वारा शारीर के भीतर जमी हुयी अशुद्धियों को शोधन प्रक्रिया द्वारा बाहर निकाला जाता है ,तथा आयुर्वेदिक औषधों के द्वारा शारीर को बल देने वाली औषधियों के प्रयोग से हृदय को मजबूत और अधिक कार्यक्षम बनाया जा सकता है , आपको मात्र दो माह की औषध सेवन के पश्चात Hypertension , fatigue , जैसी कोई भी समस्या नहीं रहेगी .
                                                                                       आप आत्मनिर्भर होकर सारा जीवन सुख पूर्वक निर्वाह कर सकते है 
आपके उत्तम स्वस्थ्य की कामना के साथ ........
Dr.Sandeep shah  (09229455119)
Dr.Abhishek Goel (09713677782, 09425759700) 

Friday, August 26, 2011

My Address for Consultation

Dear Friends ,
                                                           Dr.Abhishek Goel                             
                                             House no. C-211      Near Ayushman Hospital,
                                             Infront of Panchmukhi Hanuman Mandir , Shahpura          
                                                            Bhopal (M.P.)                                         
                                Contact no.- 09713677782, 09425759700                                        

      * Please note that i will be available  from 9.am to 3 pm . 

Wednesday, August 10, 2011

वाजीकरण चिकित्सा

जो औषध वंश परंपरा को स्थापित कराती है , अर्थात जिसके सेवन के पश्चात न सिर्फ पुरुष स्वयं रति शक्ति से परिपूर्ण होता है ,अपितु उससे उत्पन्न संतान भी उत्तम वीर्य से युक्त होकर ,स्वस्थ होने के साथ प्रजोत्पादन में समर्थ होती है .इसके सेवन से पुरुष अश्व के समान बलशाली होकर स्त्री गमन करता है , तथा स्त्रियों को अति प्रिय हों जाता है , इसके सेवन से शरीर सुपुष्ट हों जाता है . वृद्ध अवस्था में भी उत्तम संतान जनक वीर्य उत्पन्न होता रहता है . जो संतान उत्पत्ति का मूल है उसे वाजीकरण कहते हैं .........

Saturday, July 9, 2011

रसायन चिकित्सा

प्रिय मित्रों नमस्कार , आज मैं आपको आयुर्वेद के सबसे महत्त्वपूर्ण अंग रसायन चिकित्सा के बारे में आपको बताऊँगा . विशेषतः देखा जाए तो आधुनिक चिकित्सा शास्त्र रोग होने के पश्चात चिकित्सा के उपाय बताता है ,किन्तु आयुर्वेद रोग से बचने के उपाय पहले बताता है यदि फिर भी किसी कारण वश रोग हो जाये तो चिकित्सा के  उपाय बताता है .

१ रसायन चिकित्सा क्या है ?
२ इससे क्या लाभ हैं?

रसायन अष्टांग आयुर्वेद  अर्थात आठ अंगों से युक्त आयुर्वेद का वह भाग है जिसके द्वारा उत्तम स्वास्थय  तथा दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है .दीर्घायुष्य और उत्तम स्वास्थय तभी प्राप्त हो सकता है जब शरीर के सभी अंग सकुशल हों तथा शरीर इ रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्तम हो .इन्ही उद्देश्यों की प्राप्ति  हेतु रसायन चिकित्सा की जाती है . इस चिकित्सा के विधिवत सेवन से दीर्घ आयु , स्मृति (स्मरण शक्ति ) मेधा (समझ कर ग्रहण करने की शक्ति ) उत्तम आरोग्य क लाभ , तरुण वय अर्थात अकाल में वृद्ध न होना इत्यादि लाभ होते हैं .

Tuesday, July 5, 2011

ayurved chikitsakon ke naam


प्रिय मित्रों नमस्कार ,
                           आज मैं शिरोधारा और नस्य के विषय में और उनके मानस तथा neurological disorders के सम्बन्ध में विचार करना चाहूंगा तथा साथ ही साथ आप सभी वैद्यों के मत भी जानना चाहूँगा . हम सभी जानते हैं की वायु रजो गुणात्मक है तथा वात प्रकृति  के व्यक्ति का मन भी रजोगुण से भरा रहता है . वायु के गुणों में एक गुण ये भी कहा गया है "नियंता प्रणेता च मनसः" यानि के वायु जो है वह मन का नियंत्रण करता है तथा साथ में प्रेरक भी है .
          यहाँ जिस वायु विशेष के बारे में कहा गया है ,वोह शास्त्रोक्त विभाजन के आधार पर प्राण वायु है . मानस रोगों में नस्य तथा शिरोधारा का महत्व इसी से सिद्ध है की इन दोनों चिकित्सों से मस्तिष्क में प्रकुपित वायु क शमन होता है . चूंकि शिर यह उत्तमांग कहा गया है क्योंकि इस अंग से शारीर की  सभी क्रियाएँ नियंत्रित होती हैं .
                                                                          आज कल हम देखते हैं की मनुष्य की प्रवृत्ति राजसिक होती जा रही है , जिसके कारण अनेक मानसिक विकार हो रहे हैं , .